रंगो के त्योहार से एक दिन पहले होलिका दहन मनाया जाता है।(Holika Dhahan) इसके पीछे की कहानी तो आपको पहले से ही पता है कि पौराणिक काल में असुर राज हिरण्यकश्चयप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि जला नहीं सकती भगवान शंकर से ऐसी चादर मिली थी जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसको नुकसान नहीं पहुंचा सकती थी,।
वहीं हिरण्यकश्यप का बेटा प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रोध हो उठा और अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत, होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है।
बुराई पर अच्छाई के जीत के प्रतीक के रूप में होलिका दहन की शुरूआत हुई। ये कहानी तो आप सुनते आ रहें होंगे लेकिन आज हम कुछ और कहानियां भी बताएंगे जो होलिका दहन मनाने पर आधारित हैं। कहा जाता मां सती ने जब भगवान शिव से विवाह कर लिया था उसके बाद उनके पिता ने सारे रिश्ते उनसे तोड़ दिए थे और अपने घर में हुई महापूजा का न्योता तक नहीं दिया और बिना बुलाए वो अपने पिता के घर चली गईं और वहां उनके पिता दक्ष ने सती के पति भगवान शिव का अपमान किया तो उन्होनें अग्नि में खुद क समा लिया।
इसके बाद शिव को अत्यंत क्रोध आया और बेहद ही दुख हुआ अपनी सती को खोने का तो उन्होनें सब त्याग कर गंभीर ध्यान लगा लिया। इसके बाद मां सती का जन्म मां पार्वती के रूप में हुआ तो सभी देवताओं को इस बात का पता लगा और सृष्टि के असंतुलन को कायम रखने के लिए देवराज इंद्र ने भगवान शिव को ध्यान से जागृत करने के लिए उन्होनें कामदेव को उनकी समाधि जागृत करने के लिए भेजा साथ में उनका पति रति भी गईं।
अपने बाण से कामदेव ने शिवजी पर धनुष बाण चला दिया जिसके बाद शिव काफी क्रोधित हो उठे और उनके त्रिनेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया इसके बाद उनकी पत्नी रति देवी बहुत रोईं और अपने पति का जीवनदान के लिए शिव जी के चरण में गिर गईं इसके बाद देवताओं ने भगवान भोले को तारकासुर की मृत्यु का रहस्य बताया और कामदेव को फिर से जीवित करने के लिए शिव से विनती की।
तब महादेव का क्रोध शांत हुआ और उन्होनें देवताओं से कहा कि कामदेव द्वापर युग में कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। शंबर नाम का एक राक्षस उसे समुद्र में फेंक देगा। वह उस राक्षस को मार डालेगा और रति से शादी करेगा, जो समुद्र के पास एक शहर में रह रही होगी। तब से कामदेव को भगवान शिव द्वारा भस्म होने को होलिका दहन और उनके पुनर्जन्म की खुशी को होली के रूप में मनाया जाता है।
वहीं होलिका दहन पर दूसरी कहानी ये कि जब पूतना नाम की राक्षसी ने भगवान श्री कृष्ण को गोद में उठा लिया और स्तनपान कराने लगी और उन्हें लेकर वो हवा में उड़ने लगी लेकिन उस राक्षसनी को क्या पता था कि उसने अपनी मौत की दस्तक को बुला लिया है भगवान श्री कृष्ण ने स्तनपान कराते हुए पूतना का जीवन चूसना शुरू कर दिया और पूतना जो हवा में उड़ रही थी धड़ाम से नीचे गिरी और पूतना मृत्यु को प्राप्त हो गई जिसके बाद से ही ये होलिका दहन बुराई के अंत के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा।
होलिका दहन के दिन होलिका प्रज्वलित होने के बाद उसमें 11 उपलों की माला, पान, सुपारी, नारियल, अक्षत, चना इत्यादि, साथ ही भोग में मीठा अर्पित करना चाहिए, उसके बाद श्रीहरि विष्णु का नाम लेकर सात बार होलिका की अग्नि की परिक्रमा करनी चाहिए।
होलिका दहन शुरू हो जाने पर अग्नि को प्रणाम करें और भूमि पर जल डालें. अग्नि में गेहूं की बालियां, गोबर के उपले और काले तिल के दाने डालें। अग्नि की कम कम से कम तीन बार परिक्रमा करें। अग्नि को प्रणाम करके अपनी मनोकामनाएं मन में बोलें. होलिका की अग्नि की राख से स्वयं का और घर के लोगों का तिलक करें। ज्योतिषियों की माने तो होलिका की अग्नि में सभी कष्ट भस्म हो जाते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि होलिका की राख घर में लाने से कर से सारी नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त हो जाती हैं।

