साल 2002 में गुजरात के गोधरा में हुए ट्रेन अग्निकांड के दोषियों की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता गुजरात सरकार की तरफ से पेश हुए। तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय में सरकार का पक्ष रखा। इस दौरान उन्होंने ट्रेन अग्निकांड को जघन्य अपराध बताया और आरोपियों द्वारा जमानत मांगने की मांग का विरोध किया। उच्चतम न्यायलय ने दोषियों के नाम, अपराध में उनकी भूमिका और जेल में बिताए गए समय संबंधी चार्ट कोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया। बता दें कि मामले की अगली सुनवाई 3 हफ्ते बाद होगी।
इससे पहले 30 जनवरी को सुनवाई के दौरान दोषियों की ओर से कहा गया था कि उनका दोष सिर्फ यही था कि इन्होंने सिर्फ पत्थरबाजी की लेकिन वे उम्रकैद की सजा भुगत रहे हैं। गुजरात सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि सिर्फ पत्थरबाजी ही नहीं, इन लोगों ने ट्रेन की बोगी में आग भी लगाई थी।
बता दें कि पहले की सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कोर्ट को आश्वस्त किया था कि वह हर दोषी की भूमिका की जांच करेंगे कि क्या वाकई इनमें से कुछ लोगों को जमानत पर रिहा किया जा सकता है। 15 दिसंबर, 2022 को कोर्ट ने इस मामले के दोषी फारुक को जमानत दी थी। कोर्ट ने फारुक के 17 साल से जेल में होने के आधार पर जमानत दी थी।
गोधरा कांड में 59 की मौत
गौरतलब है कि 27 फरवरी, 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर एक दुखद घटना हुई थी। अहमदाबाद जाने के लिए साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन से चली ही थी कि किसी ने चेन खींचकर गाड़ी रोक ली और फिर पथराव किया। बाद में ट्रेन के S-6 डिब्बे में आग लगा दी गई। ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी। साबरमती एक्सप्रेस अयोध्या से कारसेवकों को लेकर आ रही थी। गोधरा की इस घटना के बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 2011 में 31 लोगों को दोषी करार दिया था। इनमें से 11 को फांसी की सजा और 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में 63 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया था। 2017 में गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से फांसी की सजा पाये 11 दोषियों की सजा कम करते हुए उम्रकैद में तब्दील कर दी थी और 20 को मिली उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था।

