होली का त्योहार बस तीन दिन के अंदर आने वाला लेकिन वृंदावन- बरसाना में होली का रंग एक हफ्ते पहले से चढ़ा हुआ है। 27 फरवरी से होली की उमंग वृंदावन- बरसाना यानि की राधा कृष्ण की प्रेम भूमि में शुरू हो चुकी है, लोग दूर दूर से होली मनाने राधा-कृष्ण की पवित्र मि पर पहुंच रहें और होली का आनंद लें रहें हैं। बरसाना में 27 फरवरी को लड्डू की होली का आनंद लोगों के बीच रहा। अब आप सोच रहें होंगे कि लड्डू की होली के पीछे बनाने की क्या कथा है। कहते हैं कि लड्डू की होली लोगों के बीच मिठास घोलती है। इसमें रंग-गुलाल की जगह एक दूसरे पर लड्डू फेंके जाते हैं।
कहा जाता है कि द्वापर युग में बरसाने से होली खेलने का नंदगांब में नंदबाबा को आमंत्रण भेजा गया था। नन्दबाबा ने इसे स्वीकार किया और इसकी खबर अपने पुरोहित के माध्यम से बरसाना में वृषभान जी के यहां भेजी। बरसाने में पुरोहित का लड्डू भेंट किए गए। इस दौरान गोपियों ने उन्हें गुलाल लगा दिया, पुरोहित के पास गुलाल नहीं था तो वे लड्डुओं को ही गोपियों के ऊपर फेंकने लगे। तब से ही इस दिन लड्डू की होली खेली जाती है।
इसके बाद बरसाना और नंदगांव दोनों जगह लठ्ठमार होली खेलने की परंपरा है। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को बरसाने में गोपियां बनीं महिलाएं नंदगांव से आए पुरूषों पर लाठी बरसाती हैं, इससे बचने के लिए हुरियारे ढाल का इस्तेमाल करते हैं। ये त्योहार राधा-कृष्ण के युग से ही मनाया जा रहा है।
फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रंगभरी एकादशी कहते हैं। इस दिन जब भगवान शंकर माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे, तब उनके गणों ने रंग-गुलाल से शिव का स्वागत किया था। इस दिन शिव के गण गुलाल उड़ाकर धूमधाम से बाबा संग होली मनाते हैं।
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में मुख्य होली से पहले फूलों से होली खेली जाती है। इस दिन बांके बिहारी मंदिर में भक्तों का जमावड़ा लगता है और मंदिर परिसर में जमकर फूल बरसाएं जाते हैं।

