कानपुर: हजारों वर्षों से चले आ रहे भारतीय सनातन धर्म के बाद वैश्विक पटल पर भले ही तमाम धर्मों का पर्दापण हुआ हो, लेकिन सनातन धर्म में लोगों की आस्था कभी कम नहीं हुई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 80 किमी. पर स्थित कानपुर जनपद के चकेरी इलाके में बने करौली धाम में दिख रहा है। यहां चेक गणराज्य के प्लम्लोव शहर के पूर्व डिप्टी मेयर इरी कोचांद्रल के नेतृत्व में दस सदस्यीय स्त्री-पुरुष का दल आया है। यह दल यहां पर भारतीय संस्कृति व आध्यात्म के जरिए अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए हवन-पूजन व अनुष्ठान कर रहा है। यही नहीं यह सभी लोग पूर्णिमा पर गुरु दीक्षा भी लेंगे।
कानपुर के चकेरी इलाके में है करौली धाम
ईश्वरीय चिकित्सा एवं अनुसंधान केंद्र, करौली धाम में इन दिनों चेक गणराज्य से आए आठ पुरुष व दो महिलाएं सभी के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। वे यहां अपने पितरों की मुक्ति के लिए वैदिक विधियों से हवन-पूजन और आरती कर रहे हैं। देश-विदेश से आए अन्य भक्त उन्हें देखकर रोमांचित हो रहे हैं, क्योंकि उनका भारतीयों की तरह पूजन इत्यादि करना सभी के लिए आकर्षण की बात है। इसमें भी मुख्य यह है कि ये अंग्रेज अपनी मान्यता के विपरीत पुनर्जन्म की भारतीय मान्यता को स्वीकार कर उसी तरह से अनुष्ठान कर रहे हैं जैसे भारतीय हिन्दू भगवान पर आस्था और विश्वास के साथ करते हैं।
भारतीय मित्र बना करौली धाम आना का जरिए
चेक गणराज्य के प्लम्लोव शहर से डिप्टी मेयर रहे इरी कोचांद्रल का कहना है कि अपने भारतीय मित्र व वर्ल्ड फूडाॅकान फेडरेशन के आजीवन अध्यक्ष राजीव सिन्हा के माध्यम से वे कानपुर के करौली धाम के गुरुजी डाॅ. संतोष सिंह भदौरिया के सम्पर्क में आए। इरी ने बताया कि गुरुजी ने केवल मोबाइल फोन के माध्यम से ही उनकी पत्नी वेरी की बीमारियों और उनके उपचार के बारे में बताया। इसके बाद गुरुजी से हुई बातों के बारे में उन्होंने अपने अन्य मित्रों से चर्चा की। सभी इससे प्रभावित हुए और सभी ने भारतीय दर्शन व पूजन को समझने के साथ ही पितरों की मुक्ति का हवन कराने का निर्णय लिया। भारतीय संस्कृति व आध्यात्म से जुड़ने के लिए वह कानपुर आए और यहां पंद्रह दिन तक आश्रम में रहेंगे। पूर्णिमा पर गुरु दीक्षा कार्यक्रम में प्रतिभाग करेंगे।
अंग्रेज मान रहे पूर्वज करते हैं प्रभावित
करौली सरकार आए सभी अंग्रेज मान रहे हैं कि मृत्यु के बाद किसी न किसी रूप में पितृ या पूर्वज प्रभावित करते हैं। वे भी यह आकर यह महसूस कर रहे हैं। उन्हें शांति व मुक्ति प्रदान के लिए हवन व अनुष्ठान किए जाते हैं। अंग्रेज पूरी तरह से इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। करौली धाम में नौ हवन के बाद अंग्रेजों के पूर्वजों-पितरों का मुक्ति अनुष्ठान कराया जाएगा। उसके बाद गुरुजी डाॅ. संतोष सिंह भदौरिया सभी की स्मृति रोग चिकित्सा कराएंगे और आने वाली 20 तारीख को पूर्णिमा के मौके पर उन्हें गुरु दीक्षा दी जाएगी।
यह है ईश्वरीय चिकित्सा पद्धति
करौली धाम दरबार के गुरुजी डाॅ. संतोष सिंह भदौरिया ने बताया कि मृत्यु के बाद भी भाव और सूक्ष्म शरीर बना रहता है जब तक कि उनके कर्मभोग कटकर मुक्ति न हो जाए। तब तक वे अपने वंश के जीवित सदस्यों के साथ ही बने रहते हैं। पूर्वजों के जीवन काल के सभी सुख, दुख, रोग उनके भाव व सूक्ष्म शरीर में संचित रहते हैं और परिवार के सदस्यों को प्रभावित करते रहते हैं। आधुनिक चिकित्सा उन्हें वंशानुगत बीमारी बताती रही है या फिर मनोरोग। करौली धाम में विशेष हवन अनुष्ठानों के माध्यम से भाव शरीर के उन रोगों को दूर कर दिया जाता है। यही प्राचीन ईश्वरीय चिकित्सा है।

