Venezuela News: दुनिया के नक्शे में एक बार फिर वेनेजुएला चर्चा में है। वजह है उसका बेशकीमती तेल और उस पर अमेरिका की नजर। कहा जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर सीधा कंट्रोल चाहते हैं। इसी कड़ी में वहां कड़ी कार्रवाई की गई। ड्रग तस्करी के आरोप लगाकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले जाया गया। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने अपने विदेश मंत्री मार्को रूबियो को वेनेजुएला के लिए खास जिम्मेदारी दे दी, जिसे कई लोग ‘वाइसराय’ यानी शासक जैसी भूमिका बता रहे हैं।
इन घटनाओं के बाद बड़ा सवाल खड़ा हो गया है क्या यह सब कानून और सुरक्षा के नाम पर हो रहा है या इसके पीछे असली वजह वेनेजुएला का वह गाढ़ा तेल है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा वहीं पाया जाता है और जिसे रिफाइन करने में अमेरिकी कंपनियां माहिर हैं?
दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसका बहुत छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल हो पा रहा है। सालों की राजनीतिक उठापटक, विदेशी प्रतिबंध, गलत नीतियां और कुप्रबंधन की वजह से देश का तेल उद्योग लगभग बर्बाद हो चुका है। रिफाइनरियां जर्जर हैं, मशीनें बंद पड़ी हैं और काबिल लोग देश छोड़कर जा चुके हैं।
ऐसे में जब अमेरिका कहता है कि वह वेनेजुएला के तेल उद्योग को दोबारा खड़ा करेगा, तो यह दावा जितना बड़ा है, उतना ही सवालों से भरा भी है।
गिरफ्तारी के बाद ट्रंप का खुला ऐलान
3 जनवरी की रात मादुरो की गिरफ्तारी की खबर आई और कुछ ही घंटों बाद ट्रंप ने अपने इरादे साफ कर दिए। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला में तेल का कारोबार सालों से ठप पड़ा है और अब अमेरिकी तेल कंपनियां वहां अरबों डॉलर का निवेश करेंगी। ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी कंपनियां वहां का खराब ढांचा ठीक करेंगी, तेल उत्पादन बढ़ाएंगी और मुनाफा भी कमाएंगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब वेनेजुएला की मदद के लिए है या फिर अमेरिका अपने फायदे के लिए एक कमजोर देश के संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है?
पहले अमेरिकी कंपनियों का राज
बीसवीं सदी में वेनेजुएला के तेल उद्योग पर अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों का दबदबा था। 1930 से लेकर 1970 तक तेल की खोज, उत्पादन और निर्यात पर इन्हीं कंपनियों का कंट्रोल रहा। वेनेजुएला अमेरिका का बड़ा तेल सप्लायर था।
1976 में तस्वीर बदली। तब के राष्ट्रपति कार्लोस आंद्रेस पेरेज ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया। हालांकि विदेशी कंपनियों को पूरी तरह बाहर नहीं किया गया, बल्कि उन्हें सीमित हिस्सेदारी के साथ काम करने दिया गया। इससे सरकार को कंट्रोल मिला और कंपनियों को भी पूरी तरह नुकसान नहीं हुआ।
ह्यूगो चावेज और तेल की राजनीति
असल टकराव 1999 में ह्यूगो चावेज के सत्ता में आने के बाद शुरू हुआ। चावेज ने तेल को सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ दिया। उन्होंने विदेशी कंपनियों से कहा कि सरकार की कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी माननी होगी और मुनाफे का बड़ा हिस्सा देश को देना होगा। टैक्स और रॉयल्टी भी कई गुना बढ़ा दी गई।
जो कंपनियां नहीं मानीं, उनकी संपत्तियां जब्त कर ली गईं। इसके बाद अमेरिका और यूरोप की कई कंपनियों ने वेनेजुएला और उसकी तेल कंपनी PDVSA पर अरबों डॉलर के केस कर दिए। यहीं से अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्ते बिगड़ते चले गए।
मादुरो का दौर और अमेरिकी प्रतिबंध
2013 में चावेज की मौत के बाद निकोलस मादुरो सत्ता में आए। उनके शासन में हालात और खराब हो गए। अमेरिका ने मानवाधिकार उल्लंघन, लोकतंत्र कमजोर करने और ड्रग तस्करी के आरोप लगाकर वेनेजुएला पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए।
इन प्रतिबंधों का सबसे बड़ा असर तेल उद्योग पर पड़ा। अमेरिकी कंपनियों को देश छोड़ना पड़ा। PDVSA के पास न नई तकनीक खरीदने के पैसे बचे, न ढांचा सुधारने की ताकत। नतीजा यह हुआ कि तेल उत्पादन लगातार गिरता चला गया और देश गहरे आर्थिक संकट में फंस गया।
ट्रंप का आरोप
डोनाल्ड ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि वेनेजुएला ने अमेरिकी कंपनियों की संपत्तियां “चुरा” लीं। उनका कहना है कि चावेज और मादुरो सरकार ने गैरकानूनी तरीके से अमेरिकी निवेश पर कब्जा किया। इसी आधार पर ट्रंप वेनेजुएला से तेल, जमीन और संपत्ति वापस लेने की बात करते रहे हैं।
यह सिर्फ बयान नहीं है। वेनेजुएला के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालतों में करीब 60 अरब डॉलर के मुकदमे चल रहे हैं, जिन्हें ट्रंप अमेरिकी हितों की रक्षा के तौर पर पेश करते हैं।
बदले से आगे की रणनीति
जानकारों का मानना है कि ट्रंप सिर्फ बदले की भावना से नहीं, बल्कि बड़ी रणनीति के तहत वेनेजुएला को देख रहे हैं। उनका मानना है कि अगर अमेरिकी कंपनियों को दोबारा काम करने दिया जाए, तो तेल उत्पादन बहाल किया जा सकता है। इससे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा और अमेरिकी कंपनियों को मोटा मुनाफा। लेकिन यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल।
वेनेजुएला का तेल बेहद भारी और गाढ़ा होता है। इसे निकालना, ले जाना और रिफाइन करना बहुत महंगा है। इसके लिए खास केमिकल चाहिए, जो अब आसानी से नहीं मिलते। ऊपर से प्रतिबंधों के चलते तेल निर्यात पर सख्त नजर रखी जा रही है। हाल ही में टैंकर रोके जाने और जब्त किए जाने से हालात और बिगड़े हैं।
निवेश से डरती हैं कंपनियां
विशेषज्ञों का कहना है कि वेनेजुएला में तेल उत्पादन को पुराने स्तर पर लाने के लिए कम से कम 110 अरब डॉलर का निवेश चाहिए। यह रकम इतनी बड़ी है कि अमेरिका की बड़ी तेल कंपनियां भी सोचने पर मजबूर हो जाएं। शेवरॉन जैसी कुछ कंपनियां सीमित छूट के साथ काम कर रही हैं, लेकिन ज्यादातर कंपनियां पुराने अनुभवों के कारण आगे बढ़ने से डर रही हैं।
उन्हें डर है कि सत्ता बदली तो नीतियां भी बदल जाएंगी और उनका पैसा डूब सकता है।
तेल सिर्फ मशीनों से नहीं निकलता, इसके लिए कुशल लोग भी चाहिए। वेनेजुएला से हजारों इंजीनियर और विशेषज्ञ देश छोड़ चुके हैं। अगर उत्पादन बढ़ाना है तो करीब 70 हजार कुशल कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी। इसके अलावा खराब पाइपलाइन, जर्जर रिफाइनरी, बिजली कटौती और चोरी जैसी समस्याएं पहले से मौजूद हैं।
क्या ट्रंप की योजना कामयाब होगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप की वेनेजुएला नीति सफल होगी? हकीकत यह है कि तेल उत्पादन बढ़ाना न आसान है, न सस्ता और न ही जल्दी संभव। इसके लिए स्थिर सरकार, भरोसेमंद माहौल और लंबी अवधि का निवेश चाहिए। ऊपर से ट्रंप का कार्यकाल भी सीमित है। कंपनियां जानती हैं कि कुछ साल बाद अमेरिकी नीति बदल सकती है।
ऐसे में अरबों डॉलर झोंकना एक बड़ा जोखिम है। यही वजह है कि वेनेजुएला का तेल जितना कीमती है, उतनी ही उलझी हुई उसकी राजनीति और भविष्य की तस्वीर भी है।
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