Supreme Court Verdict: मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी डाउनलोड करना और देखना अपराध है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि वह POCSO एक्ट में “चाइल्ड पोर्नोग्राफी” शब्द की जगह “चाइल्ड सेक्सुअली एब्यूसिव एंड एक्सप्लॉयटेटिव मटीरियल (CSEAM)” शब्द का इस्तेमाल करे। गौरतलब है कि मद्रास हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ केस यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उसने सिर्फ चाइल्ड पोर्न डाउनलोड किया था और किसी को नहीं भेजा था।
चंद्रचूड़ और पारदीवाला की बेंच ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शब्दों में बदलाव करके भी ऐसे मामलों की गंभीरता को समाज और न्याय व्यवस्था के ध्यान में लाया जा सकता है। CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की बेंच ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर चिंता जताई और बच्चों की कानूनी सुरक्षा के साथ तकनीकी वास्तविकताओं को संतुलित करने की जरूरत पर जोर दिया। बेंच ने कहा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी को CSEAM के तौर पर संदर्भित करने से बच्चों के शोषण का मुकाबला करने में कानूनी ढांचे और समाज दोनों में एक नया दृष्टिकोण पैदा होगा।
मद्रास उच्च न्यायालय ने दी थी राहत
पीठ ने 19 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। न्यायालय ने कहा था कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा से जुड़े गंभीर कानूनी सवालों का समाधान करना बहुत ज़रूरी है। जनवरी 2024 में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश ने 28 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ़ आपराधिक मामला रद्द कर दिया था और उसे राहत दी थी। उस व्यक्ति पर चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी देखने और डाउनलोड करने का आरोप था। न्यायमूर्ति वेंकटेश ने टिप्पणी की थी कि सिर्फ़ चाइल्ड पोर्न देखना ही POCSO और IT अधिनियमों के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज
उनके मुताबिक अगर पोर्नोग्राफी में बच्चों का इस्तेमाल होता है तो पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज हो सकता है। वहीं, जब कोई सीधे तौर पर शामिल हुए बिना सिर्फ चाइल्ड पोर्न देखता है तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करना न्यायोचित नहीं है। हाईकोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 67बी का हवाला देते हुए कहा था कि आरोपी ने न तो ऐसी सामग्री प्रकाशित की और न ही किसी को भेजी। चूंकि आरोपी ने पोर्नोग्राफी के लिए किसी बच्चे का इस्तेमाल नहीं किया, इसलिए उसके खिलाफ अपराध साबित नहीं हो सकता। हालांकि, यह कहा जा सकता है कि युवक का नैतिक पतन हुआ है। मार्च में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हाईकोर्ट के इस आदेश की आलोचना की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जज की कानूनी समझ पर भी सवाल उठाए थे

