Satyapal Malik Death: सत्यपाल मलिक का जन्म जुलाई 1946 में उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गांव में हुआ था। गांव की पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने छात्र राजनीति से अपनी शुरुआत की। मेरठ यूनिवर्सिटी से बीएससी और कानून की पढ़ाई के दौरान वे छात्रसंघ के चुनाव में कूदे और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा की नींव रखी गई।
समाजवाद से प्रेरित होकर शुरू किया राजनीतिक सफर
राजनीति में उनकी एंट्री 1965-66 में राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा से प्रेरित होकर हुई। 1966-67 में मेरठ कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष बने। इसके बाद चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल (BKD) से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते। 1975 में BKD, लोकदल में विलीन हो गई और मलिक को इसका अखिल भारतीय महासचिव नियुक्त किया गया।
राज्यसभा से कांग्रेस का सफर और फिर इस्तीफा
1980 में मलिक राज्यसभा पहुंचे और 1984 में कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस का महासचिव भी बनाया। लेकिन 1987 में बोफोर्स घोटाले के विरोध में उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और अपनी पार्टी ‘जन मोर्चा’ की स्थापना की।
जनता दल में विलय और बीजेपी की ओर कदम
जन मोर्चा को 1988 में जनता दल में विलीन कर दिया गया। 1989 में उन्होंने अलीगढ़ से लोकसभा चुनाव जीता। बाद में 2004 में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए और कई अहम पदों पर काम किया, जिनमें भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और किसान मोर्चा प्रमुख प्रमुख रहे।
राज्यपाल के रूप में निभाई बड़ी जिम्मेदारी
2017 में सत्यपाल मलिक को बिहार का राज्यपाल बनाया गया। फिर 2018 में वे जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल बने। यह एक ऐतिहासिक समय था, क्योंकि उनके कार्यकाल में अनुच्छेद 370 हटाया गया और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया।
इसके बाद उन्होंने गोवा और फिर मेघालय में राज्यपाल का कार्यभार संभाला और अक्टूबर 2022 तक पद पर बने रहे।
राजनीति में विचारधारा के साथ खड़े नेता
सत्यपाल मलिक को हमेशा एक स्पष्टवक्ता, ईमानदार और बेबाक नेता के रूप में जाना गया। उन्होंने कई बार अपनी ही पार्टी के फैसलों पर सवाल उठाकर लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान किया।
राजनीतिक यात्रा
सत्यपाल मलिक की राजनीतिक यात्रा विविधताओं से भरी रही। छात्रसंघ नेता से लेकर राज्यपाल तक का उनका सफर यह बताता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता और जनता से जुड़ाव एक नेता को कितना दूर तक ले जा सकते हैं।
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