आज से देश में नौ दिनों के लिए मां दुर्गा के नव स्वरूपों की गूंज शुरू हो चुकी है। नौ दिन तक मां के अलग अलग स्वरूपों से सुख,शांति, ऐश्वर्य, समृद्धि प्राप्त होता है। पूरी आस्था के साथ मां के नौ स्वरूप की पूजा करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। नवरात्रि को साथ साथ आज हिन्दुओं का नववर्ष भी है।
अब आप तो जानते हैं कि हम भारत की संस्कृति से ज्यादा विदेशी संस्कृति को अपनी जिंदगी में ढाल रहें हैं। साल खत्म होते ही हम अंग्रेजी संस्कृति की तरह न्यू ईयर मनाते हैं लेकिन हमारे हिन्दुओं का नववर्ष चैत्र के महीने में मनाया जाता है।
हिन्दू नववर्ष तो बहुत ही प्राचीनकाल से चला आ रहा है लेकिन इसे 2057 ईसा पूर्व विश्व सम्राट विक्रमादित्य ने नए सिरे से स्थापित किया। विक्रम संवत से पूर्व 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए प्राचीन सप्तर्षि संवत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई मानी जाती है। सप्तर्षि के बाद नंबर आता है कृष्ण के जन्म की तिथि से कृष्ण कैलेंडर का फिर कलियुग संवत का। कलियुग के प्रारंभ के साथ कलियुग संवत की 3102 ईसवी पूर्व में शुरुआत हुई थी। इसके बाद विक्रम संवत की शुरुआत हुई।
इस विक्रम संवत को ही पहले भारतीय संवत का कैलेंडर कहा जाता था लेकिन बाद में इसे हिन्दू संवत का कैलेंडर इस रूप में प्रचारित किया गया। हालांकि भारत का राष्ट्रीय संवत ‘शक संवत’ को माना जाता है जो कि भारत का है ही नहीं। इसी हिन्दू नववर्ष को ही हर प्रदेश में भिन्न-भिन्न नाम से जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है। मूल रूप से इसे नवसंवत्सर और विक्रम संवत कहा जाता है।
हिन्दू नववर्ष को महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा कहा जाता है। पौपाणिक कथाओं में यह मान्यता है कि इस दिन भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड बनाया था। इस दिन मराठी लोग गुड़ी बनाते हैं। गुड़ी बनाने के लिए एक डंडे में उल्टा पीतल का बर्तन रखा जाता है, इसे गहरे रंग की रेशम की लाल, पीली या केसरिया कपड़े और फूलों की माला और अशोक के पत्तों से सजाया जाता है। गुड़ी को ब्रह्मध्वज भी कहा जाता है। इस पर्व को लोग धूमधाम से मनाते हैं।
गुड़ी का अर्थ है ‘विजय पताका’। इस दिन अपने घरो में विजय पताका फहराते हैं। साथ ही परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे इसकी प्रार्थना भी करते है। गुड़ी का ध्वज लगाते समय दिशा का धियान रखना चाहिए घर के साउथ ईस्ट कोने यानि अग्नि कोण में पांच हाथ ऊंचे डंडे में, सवा दो हाथ की लाल रंग की ध्वज लगानी चाहिए। ध्वज लगाते समय जिन देवताओं की उपासना करके, उनसे अपनी ध्वज की रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है, उनके नाम हैं- सोम, दिगंबर कुमार और रूरू भैरव।
ध्वज लगाने के बाद इन देवताओं का ध्यान करना चाहिए और अपने घर की समृद्धि के लिये प्रार्थना करनी चाहिए। यह ध्वज जीत का प्रतीक माना जाता है। घर पर ध्वज लगाने से केतु के शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं और साल भर घर का वास्तु अच्छा रहता है। ध्वज के अलावा आज के दिन घर के मुख्य दरवाजे पर आम के पत्ते या न्यग्रोध का तोरण भी लगाना चाहिए।

