EU-India: आज की वैश्विक राजनीति में भारत पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और निर्णायक भूमिका में नजर आ रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि अमेरिका भारत के साथ समझौते करने को उत्सुक है और यूरोप खुले तौर पर यह मान रहा है कि भारत के बिना उसकी रणनीति अधूरी है। यही वजह है कि इस साल 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय यूनियन के शीर्ष नेता भारत के मुख्य अतिथि होंगे।
यह दौरा सिर्फ शिष्टाचार या औपचारिकता तक सीमित नहीं है। यूरोपीय नेता अपने साथ बड़े रणनीतिक और आर्थिक प्रस्ताव लेकर आ रहे हैं। भारत आने से पहले ही वे यह स्वीकार कर चुके हैं कि भारत अब सिर्फ एक उभरती हुई ताकत नहीं, बल्कि उनकी जरूरत बन चुका है। “भारत के बिना हम अधूरे हैं” जैसे बयान बदलते वैश्विक समीकरणों की साफ तस्वीर पेश करते हैं।
भारत बन रहा है भरोसेमंद साथी
जब पूरी दुनिया युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक दबावों से जूझ रही है, तब यूरोपीय यूनियन को भारत एक स्थिर और भरोसेमंद साझेदार के रूप में दिख रहा है। दिल्ली में होने वाला यूरोपीय यूनियन–भारत शिखर सम्मेलन इसी बदले हुए नजरिए का बड़ा संकेत है।
गणतंत्र दिवस के आसपास होने वाला यह सम्मेलन सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। इसका असर सिर्फ भारत और यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बीजिंग और इस्लामाबाद तक इसकी गूंज सुनाई देगी।
भारत को मिल रहा वैश्विक समर्थन
आज भारत को वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम स्तंभ माना जा रहा है। वहीं पाकिस्तान और चीन के लिए यह एक साफ संदेश है कि पश्चिमी देश अब सिर्फ बयान नहीं दे रहे, बल्कि भारत के साथ मजबूती से खड़े भी हैं। रक्षा, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और साइबर सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर भारत और यूरोप की नजदीकी पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का संतुलन बदल सकती है।
EU–India समिट क्यों है खास?
दिल्ली में होने वाला EU–India समिट सिर्फ मुलाकात और फोटो सेशन तक सीमित नहीं रहेगा। इस दौरान सुरक्षा, रक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग से जुड़े कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। इससे भारत और यूरोप के रिश्ते एक नए स्तर पर पहुंच सकते हैं।
यूरोपीय यूनियन की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास पहले ही कह चुकी हैं कि भारत यूरोप की आर्थिक मजबूती और रणनीतिक स्थिरता के लिए बेहद जरूरी बन चुका है। नई साझेदारी के तहत समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद से निपटने और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाया जाएगा।
हिंद महासागर में खुले समुद्री रास्तों की सुरक्षा, समुद्री निगरानी और दबाव की राजनीति के खिलाफ साझा रणनीति बनाई जाएगी। इसे चीन की आक्रामक समुद्री नीति को संतुलित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
पाकिस्तान की बढ़ेगी चिंता
आतंकवाद के मुद्दे पर भारत और यूरोपीय यूनियन का एक साथ आना पाकिस्तान के लिए परेशानी बढ़ाने वाला है। काउंटर टेररिज्म में सहयोग मजबूत होने से आतंकी नेटवर्क पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा। यूरोप का भारत के रुख को समर्थन देना पाकिस्तान की वैश्विक लॉबिंग को कमजोर कर सकता है।
चीन क्यों है बेचैन?
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता, खुले समुद्री रास्ते और नियमों पर आधारित व्यवस्था की बात सीधे तौर पर चीन की विस्तारवादी नीति को चुनौती देती है। EU–India साझेदारी के जरिए टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा में भरोसेमंद विकल्प तैयार होंगे, जिससे चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सकेगा।
सुरक्षा के साथ-साथ बड़ा आर्थिक दांव
यह साझेदारी सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच लंबे समय से अटका फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) अब आगे बढ़ता दिख रहा है। स्वच्छ तकनीक, दवाइयों और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में सहयोग से भारत को बड़ा आर्थिक फायदा हो सकता है।
इसके अलावा मोबिलिटी फ्रेमवर्क के जरिए छात्रों, कुशल पेशेवरों और रिसर्च से जुड़े लोगों के लिए नए अवसर खुलने की उम्मीद है। कुल मिलाकर आज भारत सिर्फ एक क्षेत्रीय ताकत नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का अहम केंद्र बनता जा रहा है। यूरोप का भारत की ओर झुकाव इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में दुनिया की बड़ी रणनीतियों में भारत की भूमिका और भी मजबूत होने वाली है।
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