उच्चतम न्यायालय ने आज शुक्रवार को माहवारी के दौरान छात्राओं और कामकाजी महिला कर्मचारियों को पेड छुट्टी देने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से मना कर दिया है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पी एस नरसिम्हा, जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह नीतिगत मामला है, हम इसमें दखल नहीं देंगे। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को केंद्र सरकार के केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को अपनी मांग के साथ ज्ञापन देने की अनुमति दी है।
बता दें कि वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर याचिका में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एक शोध का हवाला दिया है, जिसके मुताबिक माहवारी के दौरान एक महिला को जितना दर्द होता है, उतना ही दर्द एक व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ने पर होता है। याचिका में कहा गया था कि इस तरह का दर्द एक कर्मचारी की उत्पादकता को कम करता है, जिससे उनका काम भी प्रभावित होता है।
याचिका में खासतौर से कुछ भारतीय कंपनियां जैसे कि इविपनन, ज़ोमैटो, बायजू, स्विगी, मातृभूमि, मैग्टर, इंडस्ट्रीज़, एआरसी, फ्लाईमाईबिज और गूजूप का जिक्र किया गया है जिसमें यह कहा गया है कि यह सभी कंपनियां पेड पीरियड लीव की पेशकश करती हैं।
इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया था कि कुछ राज्यों में पेड पीरियड लीव के साथ अन्य लाभ देने की सुविधा है, लेकिन कुछ राज्यों में महिलाएं अभी भी ऐसे किसी भी लाभ से वंचित हैं। ऐसा करना संविधान की धारा 14 का उल्लंघन है।

