महाराष्ट्र की सियासत में इस समय हलचल मची हुई है। चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानकर तीर-कमान का चिह्र भी उन्हें सौंप दिया और इस्तेमाल करने की भी इजाजत दे दी है। अब इस फैसले के बाद एकनाथ शिंदे गुट और उद्धव गुट के बीच जंग शुरू हो गई है। आयोग के इस फैसले के बाद शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर दिया था। अब उद्धव ठाकरे गुट ने भी सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर लिया है।
उद्धव ठाकरे गुट की ओर से चुनाव आयोग के आदेश को चुनौती देते हुए आज ऑनलाइन याचिका दाखिल कर 20 फरवरी को अर्जेंट सुनवाई की गुहार लगाई जाएगी। ठाकरे गुट की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलीलें देने वाले सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल के मुताबिक याचिका में निर्वाचन आयोग के आदेश में कानूनी खामियों के आधार पर फैसले को चुनौती दी।
चुनौती याचिका के मुख्य आधार में आदेश का वो हिस्सा है जिसमें कहा गया है कि शिवसेना के संविधान में बदलाव एकतरफा था यानी लोकतांत्रिक तौर पर बहुमत की सहमति से संशोधन नहीं किया गया था, उन्होंने सवाल किया कि इसी संशोधन को आयोग ने पिछले साल जुलाई में हुए घटनाक्रम यानी एकनाथ शिंदे की बैठक के सिलसिले में सही मान्यता दी थी।
जब उद्धव गुट का वहीं संशोधन अलोकतांत्रिक था तो शिंदे गुट का वही संशोधन अब गलत कैसे हो गया? निर्वाचन आयोग में सांसदों और विधायकों को आम चुनाव में मिले वोट को मान्यता का आधार बनाया जाता है लेकिन जो उम्मीदवार चुनाव हारे थे, वोट तो उनको भी मिले थे।
उद्धव ठाकरे गुट का ये भी कहना है कि उसे आधार और आंकड़ों में क्यों नहीं शामिल किया गया? आखिर वो वोट भी तो जनता ने ही दिए थे। इसके अलावा भी कई ऐसे तकनीकी बिंदु और कानूनी पेंच हैं जिनको अर्जी का आधार बनाया गया है। उद्धव गुट का दावा है कि संगठन में शिंदे गुट कमजोर था और इसी वजह से बहुमत से फैसला लेने के लिए चुनाव आयोग ने उनकी ओर से पार्टी संविधान में बदलाव को अलोकतांत्रिक घोषित कर दिया जिससे इसे किनारे किया जा सके।
शनिवार को उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग के फैसले पर मंथन के लिए अपने गुट के नेताओं की बड़ी बैठक बुलाई थी। माना ये जा रहा था कि बैठक के बाद उद्धव गुट की नेता और राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी के बयान ने इन कयासों को और हवा दे दी थी जिसमें चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा गया था कि अब लोकतंत्र की रक्षा सुप्रीम कोर्ट को ही करनी होगी।

