Waqf Amendment Act case: केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि वक्फ एक इस्लामी अवधारणा अवश्य है, लेकिन इसे इस्लाम का आवश्यक हिस्सा नहीं माना जा सकता। इस आधार पर सरकार ने इसे संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिए जाने का विरोध किया।
सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत के समक्ष दलील देते हुए कहा, “वक्फ एक इस्लामी अवधारणा है, इसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन जब तक इसे इस्लाम का आवश्यक हिस्सा नहीं माना जाएगा, तब तक इससे जुड़ी अन्य सभी दलीलें निरर्थक हैं।”
सरकारी जमीन पर वक्फ का दावा नहीं
सॉलिसिटर जनरल मेहता ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति सरकारी जमीन पर दावा नहीं कर सकता, चाहे वह जमीन वक्फ के रूप में घोषित की गई हो। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का एक पूर्ववर्ती निर्णय यह कहता है कि अगर कोई संपत्ति सरकारी है और उसे वक्फ घोषित कर दिया गया है, तब भी सरकार उस संपत्ति की सुरक्षा कर सकती है।
उन्होंने यह भी कहा, “वक्फ संपत्ति कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इसे कानून के तहत मान्यता दी गई थी और यदि कोई अधिकार केवल विधायी नीति के अंतर्गत दिया गया है, तो उसे वापस भी लिया जा सकता है।”
अप्रैल में संसद से पारित हुआ था वक्फ संशोधन विधेयक
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को अप्रैल माह में संसद द्वारा पारित किया गया था और 5 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे अपनी मंजूरी दी, जिसके बाद यह विधेयक कानून बन गया। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े जबकि 232 सदस्यों ने इसका विरोध किया। राज्यसभा में इसे 128 मतों से समर्थन मिला और 95 मत विरोध में पड़े।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस बी.आर. गवाई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ कर रही है, जो विभिन्न याचिकाओं पर विचार कर रही है जिनमें वक्फ अधिनियम के हालिया संशोधनों को चुनौती दी गई है।
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