Mayawati: कांशीराम द्वारा 1980 के दशक में दलित और पिछड़े वर्ग को एकजुट कर राजनीतिक शक्ति के रूप में उभारने के उद्देश्य से बनाई गई बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने एक समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूत पकड़ बना ली थी। मायावती ने इसी जनाधार के सहारे चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली और दलित राजनीति की सबसे बड़ी प्रतिनिधि बनकर उभरीं। लेकिन 2012 के बाद सत्ता से बेदखल होने के साथ ही बसपा का सियासी ग्राफ लगातार गिरता चला गया।
कमजोर होती राजनीतिक पकड़
2012 के विधानसभा चुनाव के बाद से बसपा का जनाधार तेजी से खिसकता गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ 13% वोट शेयर मिला और पार्टी महज एक सीट जीत सकी। 2024 के लोकसभा चुनाव में तो पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई, और वोट शेयर घटकर 9.39% पर आ गया। सबसे बड़ी चिंता की बात यह रही कि सिर्फ गैर-जाटव ही नहीं, बल्कि जाटव समुदाय जो बसपा का कोर वोटर माना जाता रहा है अब वो भी पार्टी से दूरी बनाने लगा है।
संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिश
बसपा की गिरती हालत को देखते हुए मायावती लगातार संगठनात्मक बदलाव कर रही हैं। 2024 के बाद उन्होंने पार्टी में कई बैठकें की हैं और कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों के बीच संवाद बढ़ाया है। इसके तहत मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को तीसरी बार पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी है। अब उन्हें चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर बना दिया गया है, जो पार्टी में नंबर दो की भूमिका निभाएंगे। उनके अधीन तीन अन्य नेशनल कोऑर्डिनेटर रामजी गौतम, राजाराम और रणधीर बेनीवाल काम करेंगे।
दलित-ओबीसी समीकरण की फिर से तलाश
मायावती (Mayawati) की कोशिश अब दलित और ओबीसी समीकरण को दोबारा गढ़ने की है। उन्होंने 13 साल बाद ओबीसी नेताओं को पार्टी में जोड़ने का प्रयास शुरू किया है, जो एक बड़ा संकेत माना जा रहा है कि बसपा अब नए सामाजिक समीकरण तैयार करने की ओर बढ़ रही है।
पार्टी लगातार कैडर कैंप, बूथ स्तर की बैठकें, और क्षेत्रीय प्रभारीयों के साथ संवाद स्थापित कर रही है। बामसेफ को भी फिर से सक्रिय किया गया है, जो कि बसपा की वैचारिक रीढ़ माना जाता है। इसके माध्यम से पार्टी ग्रामीण इलाकों में जनजागरूकता बढ़ाने और समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है।
सियासी नैरेटिव की कमी, बनी बड़ी चुनौती
हालांकि इन तमाम प्रयासों के बावजूद बसपा का सियासी माहौल बनाने में असफल होना पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। पार्टी न तो कोई नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ पा रही है, और न ही जनता में उत्साह पैदा कर पा रही है। विरोधी दलों के आक्रामक प्रचार और सोशल मीडिया व जमीनी रणनीति के सामने बसपा की पारंपरिक शैली अब अप्रभावी होती दिख रही है।
आकाश आनंद का तीसरी बार नियुक्ति?
आकाश आनंद की तीसरी बार नियुक्ति यह संकेत देती है कि मायावती (Mayawati) अब नेतृत्व की जिम्मेदारी धीरे-धीरे अगली पीढ़ी को सौंपना चाहती हैं। हालांकि, आकाश के तेवर अब पहले की तरह आक्रामक नहीं हैं। उनकी नई भूमिका पार्टी को तकनीकी और रणनीतिक रूप से आधुनिक बनाने की दिशा में हो सकती है, लेकिन उनके नेतृत्व में क्या बसपा को नया जीवन मिलेगा, यह अभी भी एक बड़ा सवाल है।
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