केंद्र में भाजपा और मोदी सरकार के आने के बाद हिंदुत्व का मुद्दा सर चढ़ कर बोल रहा है। साल 2014 से पहले जहां हिंदू अपने आप को उपेक्षित महसूस करते थे, हिन्दुओं को लगता था कि उनकी मांगो को नजरअंदाज किया जा रहा है, उनकी आवाज को दबाया जा रहा है तो वही अब केंद्र में मोदी की सरकार आने के बाद अब वह खुल कर हिन्दू – हिंदुत्व के मुद्दों पर बातें करने लगे है और अपने हक की मांगों को लेकर आवाज भी उठाने लगे है।
बता दें कि हिन्दू बरसों से अपने तीन आराध्य के मंदिरों को लेकर मांग करती रही है। पहला, अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बाबरी मस्जिद की जगह राम लला का भव्य मंदिर.. दूसरा, बनारस में ज्ञानवापी मस्जिद की जगह काशी विश्वनाथ का विराट मंदिर और तीसरा मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि पर शाही ईदगाह की जगह भगवान लीलाधर कन्हैया का भव्य और विराट मंदिर। हालांकि अयोध्या विवाद अब सुलझ गया है और राम जन्मभूमि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का भव्य, दिव्य और अलौकीक मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है और अगले साल जनवरी में राम लला को गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा।
अयोध्या विवाद पर फैसला आने के बाद हिन्दुओं ने बाकि के अपने दो मांगो के लिए आवाज़ बुलंद करना शुरू कर दिया और एक नारा दिया :- अयोध्या – बाबरी सिर्फ झांकी है, काशी – मथुरा अब बाकि है….
इसके बाद अब हिन्दुओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में बनी ज्ञानवापी मस्जिद पर अपना दावा ठोक दिया है। एक तरफ हिन्दू ज्ञानवापी परिसर को काशी विश्वनाथ का हिस्सा मानता है तो वही दूसरी तरफ मुस्लिम हिन्दुओं के दावे को बेबुनियाद बता रहा है और उसे मस्जिद ही कह रहा है। हालाँकि दोनों के अपने अपने तर्क है।
हिंदू पक्ष का दावा है कि मुगल शासक औरंगजेब ने 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर उसपर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई थी…. इस पूरे विवाद में हिंदू पक्ष की तीन प्रमुख मांगें है…. पहला पूरे ज्ञानवापी परिसर को काशी घोषित किया जाए…. दूसरी मांग ये है कि ज्ञानवापी मस्जिद को गिराकर परिसर में मुसलमानों के आने पर रोक लगाई जाए…. और तीसरी मांग ये है कि हिंदुओं को मंदिर का पुनर्निर्माण की अनुमति दी जाए….. जबकि मुस्लिमों का कहना है कि यहां वर्षों से नमाज पढ़ी जा रही है। यह अल्लाह का इबादतगाह है।
आपको बता दें कि ज्ञानवापी परिसर को लेकर हिन्दू – मुस्लिम के बीच विवाद कोई नया नहीं…. पहला मुकदमा 1991 में वाराणसी कोर्ट में दाखिल किया गया था। उस याचिका में ज्ञानवापी परिसर में पूजा करने की अनुमति मांगी गई थी। साल 1993 में विवादित ज्ञानवापी पर वर्शिप एक्ट केस के तहत स्टे लगा दिया गया और स्थिति जैसी है वैसे ही बनाए रखने का आदेश दिया।
इसके बाद साल 2019 में एक बार फिर हिन्दुओं ने सर्वे की मांग को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन इस बार इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका पर रोक लगा दी। अगस्त 2021 में श्रृंगार गौरी मंदिर में रोजाना पूजा और दर्शन की मांग करते हुए 5 महिलाओं ने वाराणसी कोर्ट में याचिका डाली। जिसके बाद सिविल कोर्ट ने साल 2022 के अप्रैल में ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे करने और उसकी वीडियोग्राफी के आदेश दे दिए। इस सर्वे का मुस्लिम पक्ष के विरोध किया लेकिन विरोध के बीच सुनवाई जारी रही और हाईकोर्ट ने मामले को लेकर सिविल कोर्ट के आदेश को आगे बढ़ाते हुए परिसर में सर्वे की अनुमति दे दी।
कोर्ट के आदेश पर पिछले साल तीन दिन तक सर्वे हुआ था। सर्वे के बाद हिंदू पक्ष ने यहां शिवलिंग मिलने का दावा किया था। दावा था कि मस्जिद के वजूखाने में शिवलिंग है। हालांकि, मुस्लिम पक्ष का कहना था कि वो शिवलिंग नहीं, बल्कि फव्वारा है जो हर मस्जिद में होता है। इसके बाद हिंदू पक्ष ने विवादित स्थल को सील करने की मांग की थी. सेशन कोर्ट ने इसे सील करने का आदेश दिया था।
मुस्लिम पक्ष लगातार कोशिश करता रहा कि ज्ञानवापी पर कोर्ट में सुनवाई न हो.. इसको लेकर वह हर तरह का अड़ंगा लगाता रहा। आपको बता दें कि मुस्लिम पक्ष ने सेशन कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की और वर्शिप एक्ट 1991 का हवाला देते हुए इसपर रोक लगाने की मांग करता रहा। मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में यहाँ तक कहा कि यह केस सुनवाई के लायक ही नहीं है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिमो को झटका देते हुए माना कि यह सुनवाई योग्य है।
इसके बाद पांच वादी महिलाओं में से चार ने इसी साल मई में एक प्रार्थना पत्र दायर किया था. किया था. इसमें मांग की गई थी कि ज्ञानवापी मस्जिद के विवादित हिस्से को छोड़कर पूरे परिसर का ASI से सर्वे कराया जाए. इसी पर जिला जज एके विश्वेश ने अपना फैसला सुनाते हुए ASI सर्वे कराने का आदेश दिया था।
मस्जिद में सर्वे जारी है, आपको बता दें कि मुस्लिम पक्ष तहखाने की चाभी देने से मना कर रहा था। इस बात से आशंका जताई जा सकती है कि कहीं न कहीं मुस्लिम पक्ष को भी पता है कि ज्ञानवापी मस्जिद नहीं बल्कि मंदिर ही है। जब पुलिस ने इस मामले में दखल दिया तब जाकर मुस्लिम पक्ष ने तहखाने की चाभी सौपी। जब तहखाने को खोला गया तब चौकाने वाले खुलासे हुए।
बता दें कि तहखाने में खंडित मूर्ति मिली हैं। करीब चार फीट की मूर्ति को लेकर दावा किया गया है कि यह आधी मनुष्य और आधी पशु की मूर्ति है। इसे नरसिंह अवतार की मूर्ति के रूप में भी प्रदर्शित किया जा रहा है। तहखाने के भीतर मिली मूर्तियों का सर्वे किया जा रहा है। साथ ही, तहखाने में मंदिर के टूटे खंभे के अवशेष भी मिले हैं। सर्वे में दो फीट के त्रिशूल भी मिलने का दावा किया जा रहा है। इसके अलावा 4 फीट की मूर्ति के साथ-साथ 5 कलश भी वहां पाए जाने की बात सामने आई है।
लेकिन इस दौरान मुस्लिम पक्ष अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के वकील ने एक बड़ा दावा किया है। आपको बता दें कि उन्होंने कहा है कि सर्वे के दौरान मस्जिद में दिख रहा त्रिशूल का चिन्ह वास्तव में त्रिशूल का चिन्ह नहीं है बल्कि ‘अल्लाह’ लिखा हुआ है। मुस्लिम पक्ष के वकील ने दावा किया कि जितने भी दावे इस समय मीडिया रिपोर्ट में मंदिर को लेकर किया जा रहा है, वह कमीशन की कार्यवाही के वक्त की तस्वीरें और वीडियोज हैं। मुस्लिम पक्ष के वकील ने अपनी बातों पर जोर देते हुए कहा कि अभी हो रही ASI सर्वे कमीशन की कोई भी रिपोर्ट बाहर नहीं आ सकती, क्योंकि इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। वकील ने आगे कहा कि मस्जिद के गुंबद की तस्वीरें भी पिछली बार की हैं। अभी हो रही ASI सर्वे की रिपोर्ट सीलबंद होकर कोर्ट में जानी है. वह बाहर आ ही नहीं सकती है।
मुस्लिम पक्ष के वकील ने अपना दावा मजबूत दिखाने के लिए बताया कि उस दौर में जिस तरह के कारीगर रहे होंगे उन्होंने वैसे ही चीजों को इमारतों पर उकेरा है। मुगलकालीन सिक्कों पर भी स्वास्तिक और ओम की आकृति उकेरी जाती थी। इसलिए यह कह देना कि कमल का फूल सिर्फ मंदिरों पर ही बना हुआ मिलेगा, गलत है. फूल तो कोई भी बना सकता है….. उसका मंदिर या इस्लाम से कोई मतलब नहीं है….. जब वकील से ज्ञानवापी मस्जिद में त्रिशूल के चिन्ह मिलने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि जिसको आप त्रिशूल कह रहे हैं हम उसको ‘अल्लाह’ लिखा हुआ मानते हैं, क्योंकि ‘अल्लाह’ भी वैसे ही लिखा जाता है…. उन्होंने दावा किया कि वह त्रिशूल नहीं, बल्कि अल्लाह लिखा हुआ है।

