Saeeda Hameed defending Bangladeshis: हाल ही में सामने आए एक वीडियो में सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व योजना आयोग की सदस्य सैयदा हमीद ने कहा, “बांग्लादेशी होना कोई अपराध नहीं है। वे भी इंसान हैं और यह दुनिया बहुत विशाल है, जिसमें वे भारत में भी रह सकते हैं। यह कहना कि वे दूसरों के अधिकार छीन रहे हैं, न केवल भ्रामक है बल्कि अमानवीय भी है।”
उनके इस बयान ने असम की राजनीति में उथल-पुथल मचा दी और साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया। चूंकि सैयदा हमीद को कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी की करीबी माना जाता है, इसलिए यह टिप्पणी अब राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है।
किरण रिजिजू और हिमंत सरमा का तीखा जवाब
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सैयदा हमीद पर निशाना साधते हुए कहा, “मानवता के नाम पर भ्रामक बातें फैलाना गलत है। ये हमारी जमीन और पहचान का मुद्दा है। कोई कितना भी बड़ा नाम क्यों न हो, वह अवैध घुसपैठियों का समर्थन नहीं कर सकता।”
वहीं, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बयान को “जिन्ना के सपने को साकार करने की कोशिश” करार दिया। उन्होंने कहा, “असम की पहचान को मिटाने की कोशिश की जा रही है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को समर्थन देना असम को पाकिस्तान में बदलने की साजिश जैसा है। हम लाचित बरफुकन की संताने हैं, और अपनी पहचान की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक लड़ेंगे।”
राजनीतिक मकसद या मानवाधिकार की आवाज?
सैयदा हमीद का बयान कुछ लोगों के लिए मानवीय दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन असम जैसे संवेदनशील राज्य में यह मुद्दा केवल सहानुभूति तक सीमित नहीं है। यह जनसंख्या संरचना, सांस्कृतिक पहचान, और राजनीतिक संतुलन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
किरण रिजिजू ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) जैसे दलों का प्रयास है कि बिहार और असम में अवैध प्रवासियों को अधिकार देकर वोटबैंक बनाया जाए। इससे स्थानीय नागरिकों के हक छीने जा रहे हैं।
असम की पहचान और सुरक्षा का सवाल
मुख्यमंत्री सरमा ने साफ कहा कि असम कभी भी अवैध घुसपैठियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीं रहेगा। उनका कहना था कि “अवैध बांग्लादेशी प्रवासी असम की सामाजिक-सांस्कृतिक बनावट को नुकसान पहुँचा रहे हैं और यह एक सुनियोजित साजिश है।”
उन्होंने कहा कि जब देश के नेता खुद ऐसे लोगों को समर्थन देने लगते हैं, तो इससे न सिर्फ जनता का भरोसा डगमगाता है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा बन जाता है। सैयदा हमीद पर यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने इस पूरे मामले को ‘मानवाधिकार’ का चोला पहनाकर देश विरोधी एजेंडे को हवा दी है।
बयान की सच्चाई और असली खतरा
सैयदा हमीद का बयान मानवीय नजरिए से देखा जाए, तो एक सहानुभूतिपूर्ण अपील लग सकता है। लेकिन असम जैसे सीमावर्ती और ऐतिहासिक रूप से घुसपैठ से प्रभावित राज्य में, यह बयान स्थानीय नागरिकों की असुरक्षा और नाराज़गी को और बढ़ा देता है। बयान की “सच्चाई” यह है कि यह एकपक्षीय और ज़मीनी हकीकत से दूर है क्योंकि अवैध घुसपैठ सिर्फ मानवता का सवाल नहीं, राष्ट्र की सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्तित्व का भी प्रश्न है।
राजनीतिक बयानबाज़ी से अलग, ज़रूरत है ठोस नीति और नियंत्रण की ,ताकि मानवता के नाम पर देश की सीमाओं और नागरिक अधिकारों से समझौता न किया जाए।
हमारी इंटर्न सुनिधि सिंह द्वारा लिखित
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