ED raids: 26 अगस्त 2025 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दिल्ली में 13 ठिकानों पर छापे मारे। इस कार्रवाई में आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सौरभ भारद्वाज के घर की भी तलाशी ली गई। यह छापेमारी अस्पताल निर्माण में कथित घोटाले की जांच के तहत हुई, जिसमें करोड़ों रुपये के दुरुपयोग का आरोप है।
यह जांच धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के अंतर्गत हो रही है और इसका आधार दिल्ली भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) द्वारा जून 2025 में दर्ज एफआईआर है। इस मामले में केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि कई निजी ठेकेदारों और अज्ञात सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भी गंभीर आरोप हैं।
आरोप क्या हैं?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2018-2019 के बीच कुल 24 अस्पताल परियोजनाएं मंजूर की गई थीं, जिन पर लगभग ₹5,590 करोड़ खर्च किए जाने थे। हालांकि, इनमें से कई परियोजनाएं आज भी अधूरी हैं, जबकि बजट का बड़ा हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका है।
लोक नायक अस्पताल में एक नए ब्लॉक की अनुमानित लागत ₹465.52 करोड़ थी, जो चार वर्षों में बढ़कर ₹1,125 करोड़ हो गई, यानी लागत में लगभग तीन गुना इजाफा हुआ।
इसके अलावा, 2021 में सात नए अस्पतालों के निर्माण के लिए ₹1,125 करोड़ की मंजूरी दी गई थी। वर्ष 2024 तक ₹800 करोड़ खर्च किए जा चुके थे, लेकिन केवल 50% काम ही पूरा हो सका। ये आंकड़े जनता के पैसों के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग और संभावित वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करते हैं।
मामला गंभीर क्यों है?
इस घोटाले का सीधा असर दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। ऐसे समय में जब राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से तनाव में है, अस्पतालों के लिए आवंटित धन का इस तरह ग़ायब होना जनता के साथ सीधा विश्वासघात है।
दूसरा बड़ा पहलू है कि AAP ने हमेशा खुद को ईमानदार और पारदर्शी पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया है। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह पार्टी की साख और मूल विचारधारा पर सवाल खड़े कर सकते हैं।
तीसरा, यह छापेमारी ऐसे समय हुई है जब दिल्ली विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। इससे ये सवाल भी उठता है कि क्या यह कार्रवाई राजनीतिक दबाव में की गई है?
साजिश या सच्चाई?
जो तथ्य सामने आए हैं, वे गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत करते हैं। लागत का अनावश्यक बढ़ना, काम का अधूरा रह जाना, और भारी रकम खर्च हो जाना, ये सब भ्रष्टाचार की संभावना को मजबूत करते हैं।
या फिर ये राजनीतिक बदले की कार्रवाई?
छापेमारी ऐसे वक्त हुई है जब केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनी हुई है। ईडी और दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन आती हैं, जिससे यह भी आशंका उठती है कि कहीं राजनीतिक दुश्मनी के तहत विपक्ष को निशाना तो नहीं बनाया जा रहा?
ऐसे मामले पहले भी सामने आ चुके हैं महाराष्ट्र, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनावों से पहले विपक्षी नेताओं पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई देखी गई है।
ऐसे मामले पहले भी सामने आ चुके हैं
सत्येंद्र जैन, जो कि AAP के वरिष्ठ नेता हैं, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पहले ही जेल जा चुके हैं। वहीं 2022 में मनीष सिसोदिया के खिलाफ शराब नीति घोटाले में ईडी ने कार्रवाई की थी, जिसके चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा और गिरफ्तारी भी हुई।
देशभर में पिछले कुछ वर्षों में ये ट्रेंड देखने को मिला है कि ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल अक्सर विपक्षी नेताओं के खिलाफ किया जा रहा है।
जांच हो, लेकिन निष्पक्ष हो
इस मामले में सामने आए तथ्य निश्चित रूप से जांच योग्य हैं और अगर कोई घोटाला हुआ है तो जिम्मेदारों को सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन यह जरूरी है कि यह जांच राजनीतिक दबाव से मुक्त और पारदर्शी हो।
जब तक जांच निष्पक्ष नहीं होगी, तब तक यह साफ नहीं हो सकेगा कि यह वास्तविक भ्रष्टाचार है या राजनीतिक बदले की रणनीति।
अंततः, नुकसान जनता का ही हो रहा है, जिन अस्पतालों में लोगों का इलाज होना था, वे अधूरे पड़े हैं और जिन पैसों से जीवन बचाया जा सकता था, वे शायद किसी की जेब में चले गए।
हमारी इंटर्न सुनिधि सिंह द्वारा लिखित
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